काशी के कण-कण में शंकर

तीनों लोकों से न्यारी अविमुक्त काशी क्षेत्र भगवान शिव का गोपनीय रहस्यमय क्षेत्र है। यहीं सारे प्राणियों को सर्वथा मुक्ति मिलती है। इस वाराणसी क्षेत्र में सिद्धगण शिवरूप धारण कर अनेकानेक स्वरुप मेरे में समाहित होकर पंचकोश में कण कण शंकर के रूप में विराजमान होकर शिव भक्तों को शिव सामुच्य प्राप्त कराते हैं। शिवलोक प्राप्त कर सांसारिक आवागमन से मुक्त हो जाते हैं। मैं कैलाश सहित सब कुछ छोड़कर संपूर्ण वाराणसी में स्थित होकर निवास करता हूं।

“रोचते भे सदा वासो वाराणास्यां माहेश्वरो” (शिवपुराण)

ऐसा भगवान शिव माता पार्वती से सत्संग कराते हैं। कण कण में मेरा वास होने के कारण शिव भक्त एवम जो ज्ञानी हैं वे दोनो ही मुक्ति के भागी हैं। उन्हें काशी के अलावा अन्य तीर्थों की आवश्यकता नहीं होती है। काशी के प्रत्येक कण में शिव जी वास होने तथा सम्पूर्ण काशी शंकर जी की स्थली होने से जहां कहीं भी चराचर, जड़ चेतन, मानव देह त्यागता है। उन्हें शीघ्र ही मुक्ति मिल जाती है।

“शिव सामुच्य मापनोति शिवलोके महियते”
“सर्व वारदाह आमर्ययाच बाल यौवन वद्धिका: अस्याम पुर्याम मृतक शिव मुक्ता एव न संशय:”

कण कण में शिव जी का निवास होने के कारण चाहे किसी वर्ण या किसी आश्रम के हों, चाहे बाल हों युवा हो या वृद्ध हों काशी पूरी के समस्त भूभाग में मृत्यु होने पर मुक्त हो जाते हैं। चाहे वह पवित्र हो या अपवित्र हो, कन्या हो या विवाहिता, विधवा हो वंध्या, रजस्वला, प्रसूता, चाहे कैसी भी हो, इस क्षेत्र में मृत्यु होने पर मुक्ति निश्चित है। इसमें कोई संशय नहीं है।

भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं कि, कण कण शिव मय होने से स्वेदज, अंडज, उदिज, पिंडज, मरने पर मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं।

“मम क्षेत्रे मोक्षरे हि या वा वसती मानव: यथा तथा मृतः स्था च्चेन्मोक्षमापनोति निमित्तम।”

अत्यंत गोपनीय त्रिशूल में बसी काशी जैसा कैसा भी मनुष्य मोक्ष पूरी में समस्त भूभाग में वास करने वाला मुक्ति का अधिकारी हो जाता है। इस महा क्षेत्र में भगवान शंकर ने कभी नहीं छोड़ा। अतः यह अविमुक्त कहलाता है। श्रृष्टि के आदि से ही काशी क्षेत्र की महिमा, गरिमा अत्यधिक थी, फिर गंगा जी के जल के समागम से कण कण जागृत हो गया। आनंद कानन काशी आदि काल से ही मुक्ति सिद्ध है।
“अहम काशी गमिश्यामि” संकल्प मात्र से शिव जी सिद्धि प्रदान कर देते हैं।
सम्पूर्ण तीर्थों, संपूर्ण भुवन में काशी सबसे श्रेष्ठ तीर्थ है। यहां साक्षात विश्वनाथ निवास करते हैं। उनके निवास स्थान अविमुक्त महा क्षेत्र से अधिक रमणीय ब्रह्मांड में कहीं नहीं है। अविमुक्त क्षेत्र ब्रह्मांड में रहकर भी ब्रह्मांड में नहीं है। इसकी लंबाई 5 कोस है। इस 5 कोस का इंच मात्र स्थान ऐसा नहीं है जिसमे शंकर जी का वास न हो तभी तो “कण कण शंकर” कहा जाता है।
काशी महाक्षेत्र में तीनों लोकों के जितने शुभ तथा मुक्तिदायक तीर्थ हैं, तथा देवता हैं, सभी का वास विभिन्न रूपों में है। ओमकार, विश्वेश्वर, केदार खंड में करोड़ों शिव कण कण में विद्यमान हैं। भगवान शिव स्वयं कहते हैं। सभी क्षेत्रों तीनों लोक 14 भुवन में अविमुक्त क्षेत्र काशी मुझे परम प्रिय है।
इस महाक्षेत्र काशी को भगवान शिव ने स्वयं उत्पन्न किया है। यहां मानवों को श्री शंकर उपासना से सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं। अविमुक्तेश्वर क्षेत्र निवास करने वाले परम पद को प्राप्त करते हैं। जहां रोग न शोक और न ही ताप त्रय।
जो अभिष्ठ गति, दान, तप, यज्ञ, ज्ञान आदि से नहीं प्राप्त होती वह वाराणसी में कण कण में शंकर होने से सुलभ हो जाती है। जिस काशी धाम में
“देवो-देवी नदी गंगा, मिष्ठामन्नम शुभागति, वारणस्या विशालाक्षी, वास: कस्य न रोचते।”
महादेव, पार्वती, अन्नपूर्णा, विशालाक्षी विराजमान होकर काल भैरव से पूर्णवास तथा रक्षा प्राप्त हो वहां का स्थान किसे अच्छा नहीं लगेगा ऐसा कोई स्थान नहीं जहां पर शंकर जी नहीं हों इसी लिए तो “कण कण में शंकर” कहा गया है।

डा. हरिहर कृपालु त्रिपाठी
पूर्व अध्यक्ष, श्री काशी विश्वनाथ मंदिर

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