*महानाट्य : ‘दि ग्रेट महाराजा अग्रसेन’ में मुंबई के 35 कलाकारों ने दिखाया महाराजा अग्रसेन का जीवन*

*अग्रवंश के सम्राट की अग्रलीला देख जीवनी से रूबरू हुए अग्रबन्धु*
*एक रुपया एक ईंट का मंत्र देकर बने समाजवाद के पथ प्रदर्शक*
*पशु बलि से दुःखी होकर वैश्य धर्म अपनाया*
आगरा। श्री अग्रवाल संघ, प्रताप नगर जयपुर हॉउस की ओर से ‘दि ग्रेट महाराजा अग्रसेन’ नाटक का मंचन सोमवार को सूरसदन प्रेक्षागृह में किया गया। मुंबई से आए 35 कलाकारों ने अभिनय कर महाराज अग्रसेन के जीवन को जीवंत कर दिया। शुभारम्भ मुख्य अतिथि कैबिनेट मंत्री योगेन्द्र उपाध्याय, उत्तर प्रदेश लघु उद्योग निगम के अध्यक्ष राकेश गर्ग, विधायक पुरुषोत्तम खंडेलवाल, पूर्व विधायक महेश गोयल, समाजसेवी बीना लावनिया, डॉ. वी. डी. अग्रवाल और केदारनाथ अग्रवाल ने दीप प्रवज्जलित कर किया। नाटक में महाराज अग्रसेन के बाल्यकाल से लेकर वृद्धावस्था तक के जीवन को बखूबी उकेरा गया। लगभग ढाई घंटे के इस नाटक को देखने के लिए पुरे उत्तर प्रदेश से अग्रवाल समाज के लोग पहुंचे।
नाट्य में दिखाया जाता है कि भगवान श्रीराम के वंशज, भगवान श्रीकृष्ण के समकालीन, शिव के भक्त और देवी महालक्ष्मी के उपासक महाराज अग्रसेन का जन्म प्रताप पुर के महाराज श्रीवल्लभसेन के यहाँ हुआ। अग्रसेन की माता का नाम भगवती देवी था। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि को महाराजा अग्रसेन का जन्म हुआ। प्रारंभिक शिक्षा के लिए उन्हें ताण्ड्य ऋषि के आश्रम में भेजा गया। अस्त्र, शस्त्र और शास्त्र विद्या में पारंगत होकर 14 वर्ष की उम्र में वह वापस आए, उन्हें देखकर देवी भगवती का दिल भर आया। फिर वह अपने पिता के साथ दरबार में आए तो वहां युधिष्ठिर के द्वारा धर्म युद्ध में प्रवेश के लिए वल्लभ सेन को निमंत्रण मिला, वल्लभसेन ने उसे सहर्ष स्वीकार किया। महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह के हाथों वल्लभसेन का वध हुआ।
*एक पैर पर खड़े होकर 1100 दिन की मां लक्ष्मी की उपासना*
अग्रसेन ने बाकी के युद्ध में अपनी युद्ध कला का कौशल दिखाया। वापस नगर आने पर प्रतापपुर शोक में डूब गया, उनके चाचा कुंदसेन और उनके पुत्र वज्रसेन ने षड्यंत्र रचा और अग्रसेन को गिरफ्तार कर कारागार में डाल दिया। कारागार के अमात्य ने अपना राजधर्म निभाया और अग्रसेन को कारागार से भगा दिया। जंगल में भटकते अग्रसेन पर कुंदसेन हमला कर उन्हें मारने की कोशिश करता है, परंतु अग्रसेन अपने चाचा को हाथ काटकर जंगल में गुम हो गए, जहां उनकी मुलाकात महर्षि गर्ग से हुई। गर्ग ऋषि ने उन्हें शरण दी और उनका मार्गदर्शन किया जिस कारण अग्रसेन 1100 दिवस तक महादेवी लक्ष्मी की एक पैर पर खड़े होकर उपासना करने लगे। देवी महालक्ष्मी ने उन्हें दर्शन दिए।
*एक पत्नी के पथ प्रदर्शक बने अग्रसेन*
गर्ग ऋषि के मार्गदर्शन में उन्होंने आग्रेय राज्य का निर्माण किया। परिणय सूत्र में बंधने के लिए उन्होंने नागवंश में अपना पराक्रम दिखाया, देवी माधवी का दिल जीता। नागराज महीधर को एहसास दिलाया कि वह माधवी के लिए सर्वत्र योग्य हैं। महीधर ने जब अपनी अन्य पुत्रियों के साथ भी विवाह का अनुरोध किया तो महाराज अग्रसेन ने मना कर एक पत्नी प्रथा के वह पथ प्रदर्शक बने।
*18 दिन नांगल ऋषि द्वारा नारियल की आहुति दिलाई*
उनके 18 पुत्र और एक पुत्री हुई, तब गर्ग ऋषि ने गोत्र कृत यज्ञ के लिए अग्रसेन को सुझाव दिया। यज्ञ में 17 दिन रोज एक पशु की बलि को देखकर उन्होंने यज्ञ रुकवा दिया और निर्णय किया कि “यदि पशु बलि गर्ग ऋषि क्षत्रिय धर्म है तो मैं क्षत्रिय धर्म का परित्याग करता हूं और वैश्य धर्म को स्वीकार करता हूं।”
*सूरसदन में गुंजी मुकेश खन्ना की आवाज़*
नाटक के निर्माता योगेश अग्रवाल है। इस कथा का नाट्य रूपांतरण, परिकल्पना और निर्देशन प्रदीप गुप्ता ने किया है। इस नाट्य में पार्श्वगायन पद्मश्री सुरेश वाडेकर और सुरभि गुप्ता ने दिया। संगीत राजधर शुक्ला ने दिया। सूरसदन में पार्श्व ध्वनि में सूत्रधार की आवाज अभिनेता मुकेश खन्ना की रही।
*एक रुपया एक ईंट देकर शुरू की सहयोग की प्रथा*
महाराजा अग्रसेन की इंद्र से मित्रता हुई। प्रजा में समानता के लिए उन्होंने घोषणा की कि जो भी नगरवासी आजीविका के हीन हो उसे सभी नगरवासी एक रुपया और एक ईंट देकर उसका सहयोग करे। इस तरह समाजवाद के पथ प्रदर्शक बने और प्रजा के हृदय में भगवान का स्थान प्राप्त किया। इस अवसर पर अध्यक्ष राजकुमार अग्रवाल, महामंत्री राजेश जिंदल, कोषाध्यक्ष राजीव अग्रवाल, कार्यक्रम संयोजक गौरव बंसल, संयोजक शशिकांत अग्रवाल, भगवान दास सेवला, शकुन बंसल, विजय सिंघल, प्रभात गोयल, दीपक अग्रवाल, रवि मंगल, हिमांशु गर्ग, संतोष अग्रवाल, संजीव गोयल, मयंक मंगल, संदीप अग्रवाल, रविशंकर बंसल, राजीव फेंसी, प्रवीन अग्रवाल, नवीन अग्रवाल, सीए अंकुर आदि मौजूद रहे।
रिपोर्टर -गोविन्द शर्मा
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