विश्वकर्मा होने का अर्थ !

प्राचीन आर्य – संस्कृति के विकास में जिस तरह आर्य ऋषियों की भूमिका रही थी, वैसी ही भूमिका आर्य सभ्यता के निर्माण में उस युग के वास्तुकारों और यंत्र निर्माताओं की थी। पुराणों ने जिस एक व्यक्ति को उस सभ्यता के विकास का सर्वाधिक श्रेय दिया है, वे हैं विश्वकर्मा। उन्हें जीवन के लिए उपयोगी कुआं, बावड़ी, जलयान, कृषि यन्त्र, आभूषण, भोजन-पात्र, रथ आदि का अविष्कारक माना जाता है। अस्त्र-शस्त्रों में उन्होंने कर्ण के रक्षा कुंडल, विष्णु के सुदर्शन चक्र, शिव के त्रिशूल, यम के कालदंड का निर्माण किया था। भवन निर्माण के क्षेत्र में उनकी महान उपलब्धियों में इंद्रपुरी, वरुणपुरी, कुबेरपुरी, सुदामापुरी, द्वारिका, हस्तिनापुर जैसे नगरों का निर्माण शामिल है। पुराणों में उनके समकक्ष आर्येतर जातियों के एक और वास्तुकार मयासुर या मय दानव का उल्लेख है। मय ने त्रेता युग में सोने की लंका और द्वापर युग में पांडवों के वैभवशाली इंद्रप्रस्थ नगर और अद्भुत सभा-भवन का निर्माण किया था। मय ने ही त्रिपुर के नाम से प्रसिद्द सोने, चांदी और लोहे के तीन नगरों की रचना की थी जिन्हें भगवान शिव द्वारा ध्वस्त किया गया। लोगों को एक बात चकित करती है कि विश्वकर्मा और मयासुर की उपस्थिति राम के त्रेता युग से कृष्ण के द्वापर युग तक कैसे संभव है। इसका समाधान यह है कि जैसे विश्वामित्र, परशुराम आदि वैदिक ऋषियों के जाने के बाद उनके नाम से उनकी शिष्य परंपराएं युगों तक चलीं, वैसे ही विश्वकर्मा और मय की वंश और शिष्य परंपराएं उनके नाम से युगों तक निर्माण और आविष्कार में लगी रहीं।

आज विश्वकर्मा की जयंती के अवसर पर प्राचीन भारत के इस महान अभियंता को नमन ! दुखद यह है कि आर्येतर होने की वज़ह से उनके समकक्ष एक दूसरे महान अभियंता मयासुर को आर्य जातियों ने वह सम्मान नहीं दिया।

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