अनेकता में भी एकता यही भारतीय संस्कृति की विशेषता है – स्वामी अवधेशानंद गिरि

हरिद्वार। पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – “अग्ने यं यज्ञमध्वरं विश्वत: परिभूरसि। स इद्देवेषु गच्छति …”। मनुष्य जन्म से ही अपूर्व सामर्थ्य, अतुल्य तेज व अन्तहीन संभावनाओं से परिपूर्ण है; किन्तु महत कार्य सामुदायिक प्रयत्न से त्वरित फलीभूत होते हैं। एकात्मता और समन्वय ही कार्यसिद्धि के मूल मंत्र हैं ! अतः समन्वित रहें! संयम, शांति, सौहार्द, सांप्रदायिक-एकता एवं समन्वय ही धर्म का वास्तविक स्वरूप है ! वैश्विक महामारी से संपूर्ण विश्व में भय, अवसाद और हताशा का वातावरण है। यह समय समन्वय व आपस में एकात्मता स्थापित करने का है। यह काल साहस, धैर्य, सहनशीलता एवं मन की शक्तियों को जगाने का है। अनन्त की अनुभूति के कई मार्ग हैं। अब यह यात्री की क्षमता पर निर्भर करता है कि वह अपने लिए किस मार्ग को चुने। साधना की पहली सीढी है – उपयुक्त का चुनाव। इस दृष्टि से मार्गों में भेद हो जाता है, लेकिन इन सबमें एक तत्व अनिवार्य है – ’आस्था’। यह किसी भी मार्ग की सफलता के लिए आवश्यक है। आस्था सम्मिश्रण है – श्रद्धा और विश्वास का। साधक की लक्ष्य के प्रति पूर्ण श्रद्धा होनी चाहिए और विश्वास होना चाहिए उन साधनों के प्रति, जिन्हें वह अपना रहा है। इस प्रकार पूर्व के अनुभव, भविष्य के प्रति श्रद्धा और वर्तमान के प्रति विश्वास का समन्वय ऐसी आधार भूमि का निर्माण करते हैं, जिनसे सफलता बचकर निकल ही नहीं सकती …।

पूज्य “आचार्यश्री” जी ने संकट में समन्वय स्थापित कर जरुरतमदों की मदद करने और सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया। उपक्रम के सभी कार्य समन्वय से ही पूर्ण सफल होते हैं। अत: यह कहा जाता है कि समन्वय प्रबन्ध का सार (Essence) है। बिना समन्वय के किसी भी कार्य को सफल नहीं बनाया जा सकता है। सम्पूर्ण विश्व एक कुटुम्ब है। प्रत्येक प्राणी के अधिकार, सम्मान-स्वाभिमान संवेदनाएं अभिरक्षित हों एवं लौकिक-पारलौकिक अनुकूलताओं के सृजन की प्रतिबद्धता के साथ भारतीय संस्कृति एकत्व, सह-अस्तित्व एकात्मकता में विश्वास रखती है, इस दिव्यता को अनुभूत कर हमें अपनी संस्कृति पर गर्व है ! अनेकता में भी एकता यही भारतीय संस्कृति की विशेषता है। भारतीय संस्कृति के प्रमुख तत्व त्याग के कारण से मनुष्य में संतोष गुण परिपूर्ण रहता है। त्याग की भावना से मनुष्य के मन में दूसरों की सहायता एवं सहानुभूति जैसे गुणों का विकास होता है और स्वार्थ और लालच जैसी बुरी भावनाओं का नाश होता है। यहाँ पर त्याग की भावना में जन-कल्याण की भावना छिपी होती है। संयम भारतीय संस्कृति की प्रमुख विशेषता होती है। भारतीय संस्कृति में उन्मुक्त अथवा स्वच्छन्द सुख भोग का विधान नहीं है। मुक्त सुख भोग से मानव में लालच प्रवृति का उदय होता है और व्यक्ति हमेशा असंतोषी बना रहता है। अतः भारतीय संस्कृति संयम का आदेश देती है। भारत में विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं। वे सभी अपने-अपने धर्मों में विश्वास और निष्ठा रखते हैं और दूसरों के धर्म के प्रति सम्मान भी करते हैं। इस प्रकार अनेकता में भी एकता यही भारतीय संस्कृति की विशेषता है …।

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