मिर्जापुर। आज मोहर्रम के पवित्र त्यौहार पर नगर के विभिन्न स्थानों से ताजियादारों इमामबाड़ा स्थित कर्बला पर बारी बारी से पहुँचकर फूल माला को दफन किया।
इस दौरान समाज में हिंदू मुस्लिम भाईचारा का एक परिचय देते हुवे गंगा जमुनी तर्ज पर लोगो ने त्योहार मनाया।
लोगों ने आपसी मिलन और भाई चारे का संदेश दिया। हिंदू मुस्लिम भाईचारे का इस मोहर्रम के गमी त्यौहार पर आपसी सौहार्द देखने को मिला।इस दौरान सभी लोग कोविड नियमो का भली भांति पालन करते हुए त्योहार मनाया।
वहीं कर्बला कमेटी के सदर उस्मान खां ने बताया कि मुहर्रम का महीना 11 अगस्त से शुरू हो चुका है। मुहर्रम का दसवां दिन आशूरा होता है। इस दिन मुहर्रम मनाया जाता है। इस वर्ष 20 अगस्त यानी कि शुक्रवार यानी आज मुहर्रम की दसवीं तारीख है।
मुहर्रम महीने की दस तारीख को कर्बला की जंग में पैगंबर हजरत मोहम्मद के नवासे हजरत इमाम हुसैन की शहादत हुई थी। हजरत इमाम हुसैन ने इस्लाम की रक्षा के लिए खुद को कुर्बान कर दिया था। इस जंग में उनके 72 साथी भी शहीद हुए थे। कर्बला की जंग हजरत इमाम हुसैन और यजीद की सेना के बीच हुई थी। हजरत इमाम हुसैन का मकबरा इराक के शहर कर्बला में उसी जगह है जहां यह जंग हुई थी। यह शहर इराक की राजधानी बगदाद से 120 किलोमीटर दूर है।
कर्बला की जंग तकरीबन 1400 साल पहले हुई थी। यह जंग जुल्म के खिलाफ इंसाफ और इंसनियत के लिए लड़ी गई थी। दरअसल, यजीद नाम के शासक ने खुद को खलीफा घोषित कर दिया था और वो अपना वर्चस्व कायम करना चाहता था। उसने इसके लिए लोगों पर सितम ढाए और बेकसूरों को निशाना बनाया। वह हजरत इमाम हुसैन से अपनी स्वाधीनता स्वीकार कराना चाहता था। उसने इमाम हुसैन को भी तरह-तरह से परेशान किया लेकिन उन्होंने घुटने नहीं टेके। जब यजीद की यातनाएं ज्यादा बढ़ गईं तो इमाम हुसैन परिवार की रक्षा के लिए उन्हें लेकर मक्का हज पर जाने का फैसला किया। हालांकि, उन्हें रास्ते में मालूम चल गया कि यजीद के सैनिक वेश बदलकर उनके परिवार को शहीद कर सकते हैं।





