हरिद्वार। पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने ‘चैत्र नवरात्रि’ एवं ‘हिन्दू नववर्ष’ के शुभागमन के शुभ-अवसर पर कहा – नव उमंग, नवोन्मेष, नव-उल्लास अर्थात् प्रकृति के नव श्रृंगार की मंगल वेला वैदिक नववर्ष शक संवत 1953, कलि संवत 5123, विक्रम संवत 2078 “आनन्द” नामक नवसंवत्सर की हार्दिक शुभकामनाएँ ..! नव-संवत्सर का यह सूर्य सम्पूर्ण विश्व को इस वैश्विक संकट से उभारे। आपके सकल भ्रम, भय व अल्पता का भंजन कर जीवन को शुभता, साधन-संपन्नता और दिव्यता से युक्त बनाएं ! यह वर्ष सबके लिए मंगलकारी हो। “विक्रम संवत्सर” अत्यंत प्राचीन संवत है। भारत के सांस्कृतिक इतिहास की दृष्टि से सर्वाधिक लोकप्रिय राष्ट्रीय संवत ‘विक्रम संवत्सर’ ही है। पुराणों के अनुसार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ब्रह्मा जी ने सृष्टि निर्माण किया था, इसलिए इस पावन तिथि को ‘नव-संवत्सर’ पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। शास्त्रीय मान्यतानुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि के दिन प्रात:काल स्नान आदि से शुद्ध होकर हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प और जल लेकर “ॐ भूर्भुव: स्व: संवत्सर- अधिपति आवाहयामि पूजयामि च …” इस मंत्र से नव-संवत्सर की पूजा करनी चाहिए। ऐसा माना जाता है कि चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने देश के सम्पूर्ण ऋण को, चाहे वह जिस व्यक्ति का भी रहा हो, स्वयं चुकाकर ‘विक्रम संवत्सर’ की शुरुआत की थी। ये भी मान्यता है कि सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने देशवासियों को शकों के अत्याचारी शासन से मुक्त किया था। उसी विजय की स्मृति में चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से ‘विक्रम संवत्सर’ का आरम्भ हुआ था। चैत्र शुक्ल प्रतिपदा एक स्वयं सिद्ध अमृत तिथि है एवं इस दिन यदि शुद्ध चित्त से किसी भी कार्य की शुरुआत की जाए एवं संकल्प किया जाए तो वह अवश्य सिद्ध होता है …।
पूज्य “आचार्यश्री” जी ने कहा – माँ दुर्गा की आराधना का पर्व “चैत्र नवरात्रि” अपनी आत्मा के उत्थान का भी पर्व है। माँ ही आद्य शक्ति हैं, सर्व गुणों का आधार, राम-कृष्ण, गौतम, कणाद, पुलह, पुलत्स्य आदि ऋषि – ऋषिकायों, वीर-वीरांगनाओं की जननी हैं। नारी इस सृष्टि और प्रकृति की ‘जननी’ है। नारी के बिना तो सृष्टि की कल्पना भी नहीं की जा सकती। जीवन के सकल भ्रम, भय, अज्ञान और अल्पता का भंजन एवं अंतःकरण के चिर-स्थायी समाधान करने में समर्थ है – विश्वजननि पराशक्ति श्री माँ दुर्गा जी की उपासना। नवरात्रि ईश्वर के स्त्री रूप को समर्पित है। दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती स्त्री-गुण यानी स्त्रैण के तीन आयामों के प्रतीक हैं। “माँ” यह वो अलौकिक शब्द है, जिसके स्मरण मात्र से ही रोम-रोम पुलकित हो उठता है, हृदय में भावनाओं का अनहद ज्वार स्वतः उमड़ पड़ता है और मनोमस्तिष्क स्मृतियों के अथाह समुद्र में डूब जाता है। ‘माँ’ वो अमोघ मंत्र है, जिसके उच्चारण मात्र से ही हर पीड़ा का नाश हो जाता है। इसलिए ‘माँ’ की ममता और उसके आँचल की महिमा को शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता है, उसे सिर्फ अनुभव किया जा सकता है …।
पूज्य “आचार्यश्री” जी ने कहा – नवरात्रि अर्थात् देवी की नवधा शक्ति जिस समय एक महाशक्ति का रूप धारण करती है, उसे ही ‘नवरात्रि’ कहते हैं। नवरात्रि नवनिर्माण के लिए होती है, चाहे वह आध्यात्मिक हो या भौतिक। आदिकाल से ही मनुष्य की प्रकृति शक्ति साधना की रही है। शक्ति साधना का प्रथम रूप दुर्गा ही मानी जाती हैं। मनुष्य तो क्या देवी-देवता, यक्ष-किन्नर भी अपने संकट निवारण के लिए मॉ दुर्गा को ही पुकारते हैं। हमारे देश में ‘माँ’ को ‘शक्ति’ का रूप माना गया है और वेदों में ‘माँ’ को सर्वप्रथम पूजनीय कहा है। इस श्लोक में भी इष्टदेव को सर्वप्रथम ‘माँ’ के रूप में ही उद्बोधित किया गया है – “त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या च द्रविणम त्वमेव, त्वमेव सर्वम् मम देव देव …”।। हमारे वेद, पुराण, दर्शनशास्त्र, स्मृतियां, महाकाव्य, उपनिषद आदि सब ‘माँ’ की अपार महिमा के गुणगान से भरे पड़े हैं। असंख्य ऋषि, मुनियों, तपस्वियों, पंडितों, महात्माओं, विद्वानों, दर्शनशास्त्रियों, साहित्यकारों और कलमकारों ने भी ‘माँ’ के प्रति पैदा होने वाली अनुभूतियों को कलमबद्ध करने का भरसक प्रयास किया है। इन सबके बाद भी ‘माँ’ शब्द की समग्र परिभाषा और उसकी अनन्त महिमा को आज तक कोई भी शब्दों में नहीं पिरो पाया है …।
? पूज्य “आचार्यश्री” जी ने कहा – माँ सिर्फ आसमान में कहीं स्थित नही हैं, उसे कहते हैं कि “या देवी सर्वभुतेषु चेतनेत्यभिधीयते …” – अर्थात्, “सभी जीव-जंतुओं में चेतना के रूप में हे माँ ! देवी तुम ही स्थित हो” नवरात्रि माँ के अलग-अलग रूप को निहारने का सुन्दर त्योहार है। जैसे कोई शिशु अपनी माँ के गर्भ में 9 महीने रहता है, वैसे ही हम अपने आप में, परा प्रकृति में रहकर ध्यान में मग्न होने का इन 9 दिनों का महत्व है। वहाँ से फिर बाहर निकलते हैं तो सृजनात्मकता का प्रस्सफुरण जीवन में आने लगता है। माना जाता है कि नवरात्र में किए गए प्रयास, शुभ-संकल्प बल के सहारे देवी दुर्गा की कृपा से सफल होते हैं। काम, क्रोध, मद, मत्सर, लोभ आदि जितने भी राक्षसी प्रवृति हैं, उसका हनन करके विजय का उत्सव मनाते हैं। अतः हर एक व्यक्ति जीवनभर या पूरे वर्ष भर में जो भी कार्य करते-करते थक जाते हैं तो इससे मुक्त होने के लिए इन 9 दिनों में शरीर की शुद्धि, मन की शुद्धि और बुद्धि में शुद्धि आ जाए, सत्व शुद्धि हो जाए; इस तरह के शुद्धिकरण करने का व पवित्र होने का त्योहार है – यह ‘नवरात्रि’ …।
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