प्रणतपाल को अच्छा वक्ता होना पड गया भारी, किशन सिंह, सत्यपाल निकले चतुर

  • अपने काम और अपने नाम के दम पर मैदान में उतरे उम्मीदवार ही जीते
  • भाजपा की नीतियों का बखान करते रहे अधिकांश उम्मीदवारों को मिली हार

मथुरा/ मदन सारस्वत। केन्द्र और प्रदेश में सरकार होने के बावजूद भाजपा समर्थित उम्मीदवार पार्टी की नीति और रीति का बखान करने से कतराते रहे। भाजपा समर्थित जिन उम्मीदवारों ने जिला पंचायत के चुनाव में जीत हासिल की है उनमें से अधिकांश अपनी छवि, अपने काम और जनता के बीच अपनी उलब्धता को लेकर वोट मांगते रहे। यहां तक कि तमाम जगह पार्टी उम्मीदवार यह कहते नजर आये कि वह आपके काम आते हैं, आपके बीच रहते हैं। पार्टी को देख कर नहीं मुझे देख कर अपना फैसला करो किसे जिताना है किसे नहीं। ऐसे उम्मीदवार भाजपा की नीतियों का बखान करने से बचते रहे। कृषि कानून जैसे मुद्दों और इनसे किसानों को होने वाले लाभ की चर्चा तक भाजपा समर्थित उम्मीदवारों ने नहीं की, यहां तक कि गाहे बगाहे इस तरह के प्रसंग छिड जाने पर पार्टी उम्मीदवार इन मुद्दों पर बोलने बचते रहे। स्थानीय स्तर पर और अपनी छवि तथा मेहनत पर वोट मांगने वाले पार्टी उम्मीदवारों को जीत मिली है। पूर्व विधायक प्रणतपाल के बेटे विवेक की हार के पीछे भी इसे बडा कारण माना जा रहा है। क्षेत्र के लोगों का मानना है कि प्रणतपाल की छवि कट्टर भाजपाई की है। प्रणतपाल अच्छे वक्ता भी है। बेटे के चुनाव की कमान भी उन्होंने खुद सम्हाल रखी थी। प्रणतपाल चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा की नीतियों का बखान करते रहे और बचाव में तर्क भी देते रहे। पूरा चुनाव प्रचार उन्होंने पार्टी लाइन पर लडा जिसकी वजह से वह किसानों की सहानुभूति खोते रहे। लगभग यही स्थित मनीषा पारासर के चुनाव प्रचार अभियान की रही। वहीं वार्ड 20 से किशन सिंह, वार्ड 33 से सत्यपाल चैधरी की रणनीति काम कर गई। वार्ड 33 से सत्यपाल चैधरी की पत्नी मंजू चैधरी चुनाव लडीं लेकिन चुनाव की पूरी जिम्मेदार सत्यपाल चैधरी ने ली। इन दोनों ही वार्ड से भाजपा उम्मीदवार होते हुए भी दोनों प्रत्याशियों ने खांटी भाजपाई होने के तगमे को अपने दूूर रखा। पार्टी की नीतियों पर बात करने से दोनों ही बचते रहे। क्षेत्र की नजता के लिए कितना काम किया है और लोगों के बीच उनकी कितनी उपलब्धता रही है यही बातें उनके चुनाव अभियान के केंद्र में रहीं। पार्टी की योजनाएं, नीतियां और कृषि कानून यहां तक कि किसान सम्मान निधि जैसे योजनाओं का भी जिक्र उम्मीदवारों ने नहीं किया। इसका लाभ भी इन्हें मिला और किसानों की नारागजी मोल लेने से बच गये।
भगवान कृष्ण की लीलाभूमि में जिला पंचायत चुनाव परिणाम बहुत ही हैरान कर देने वाले हैं। जिस जिले में भाजपा की सांसद, सरकार में दो मंत्री और कई विधायक हों वहां भाजपा की करारी हार हुई है। बहुजन समाज पार्टी ने जिला पंचायत चुनाव में भाजपा के चारों खाने चित कर दिया है। जिले में बसपा ने सर्वाधिक 13 सीट जीतकर पहला स्थान प्राप्त किया है और भाजपा और रालोद आठ-आठ सीट जीतकर बराबरी पर रही। जिले में तीन सीटों पर निर्दलीय और सपा के हाथ सिर्फ एक सीट लगी है। काबिलेगौर बात यह है कि जिला पंचायत चुनाव परिणाम आगामी विधानसभा चुनाव में राजनीतिक दलों की स्थिति की ओर इंगित कर रहे हैं। हाल ही में आए पंचायत चुनाव परिणाम को देखने से स्पष्ट हो गया है कि आगामी विधानसभा चुनाव में जिले की जनता का भाजपा से मोह भंग हो गया है।

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