उपनिवेशवाद, बाजारवाद और हथियारों के होड़ ने प्राकृतिक संसाधनों का विनाश किया है – के एन गोविंदाचार्य

धार। राष्ट्रीय स्वभिमान आंदोलन के संस्थापक संरक्षक श्री के एन गोविंदाचार्य जी की नर्मदा दर्शन यात्रा और अध्ययन प्रवास का आज 15 वां दिन है। 20 फरवरी को अमरकंटक से यात्रा शुरू हुई थी। श्री गोविंदाचार्य जी नर्मदा जी के दक्षिणी तट की यात्रा सपन्न करके उत्तरी तट पर आगे बढ़ रहे हैं। 3 मार्च को भरुच से उत्तरी तट की यात्रा शुरू हुई थी जो 14 मार्च को अमरकंटक में संपन्न होगी।

शनिवार को श्री गोविंदाचार्य जी ने धार जिले के नवादपुरा, पिपलिया, देदला, बालीपुर स्थित अंबिका आश्रम और मांडवगढ़ के श्री चतुर्भुज राम मंदिर में लोक संवाद, मंदिर दर्शन और भ्रमण किया। लोगों ने यात्रा दल का हर्षोल्लास से स्वागत किया।
मांडवगढ़ के श्री चतुर्भुज राम मंदिर में नदी, नियति और नेपथ्य विषय पर बोलते हुए श्री गोविंदाचार्य जी ने कहा, उपनिवेशवाद, हथियारवाद, सरकारवाद और बाजारवाद से पिछले 500 सालों में विकास के नाम पर विनाश हुआ। तीर्थाटन बदल गये पर्यटक स्थल के रूप में।
मानव केंद्रित भौतिक विकास से भारत में पिछले 60 सालों में 50 फीसद जैव विविधता नष्ट हुआ है। 2030 तक कोई उपाय नहीं किया गया तो भयानक स्थिति पैदा हो जाएगी।
उन्होंने कहा, बाजारवाद के दौर में लोगों ने आवश्यक क्या है, क्या नष्ट हो रहा क्या बन रहा इसका विवेक खो दिया है।
श्री चतुर्भुज राम मंदिर की पुरानी इमारत को लेकर चर्चा करते हुए श्री गोविंदाचार्य ने कहा, हजारों साल पुराना होने के बावजूद भारत में हैरिटेज साइटों की बेहद उपेक्षा है। अमेरिका 300 साल पुराना देश है और इंग्लैंड समाज बनने की दिशा में है। अमेरिका में 10 लाख से ज्यादा हेरिटेज साइट और इंग्लैंड में 6 लाख के करीब हेरिटेज साइट है। भारत में कुल हेरिटेज साइट 4 हजार से कम है। आप कल्पना करिए हजारों साल का समाज और इतने कम हेरिटेज साइट। हेरिटेज साइट का विशेष महत्व होता है। जैसे-काशी में विश्वनाथ मंदिर, अन्नपूर्णा, संकटमोचन, चेतसिंह का किला हेरिटेज साइट नहीं है। चेतसिंह ने जिन दो सिपाहियों को मारा था उनके कब्र हेरिटेज साइट हैं। इस स्थिति के पीछे आर्किलाजिकल सर्वे के आकलन के नियम हैं। वही गलत है।
श्री गोविंदाचार्य जी ने नर्मदा जी की महिमा को लेकर बोलते हुए कहा, हजारों-लाखों साल से नर्मदा मईया अस्तित्व में है। जिस स्वरुप में हमें आज प्राप्त हुईं उससे बेहतर स्वरूप में अगली पीढ़ी को प्राप्त हो यही अपना कर्तव्य है। उन्होंने कहा, सभ्यताओं का विकास नदियों के किनारे हुआ क्योंकि उसके लिए जल की आवश्यकता होती है आने वाली पीढ़ी को सुसंस्कृत भारत प्रदान करने के लिए नर्मदा जी के प्राकृतिक प्रवाह को बनाना होगा।
श्री गोविंदाचार्य जी ने अपनी यात्रा के संबंध में बताया कि कि मैं तो दर्शनार्थ मुक्ति के आस्था से निकला हूं। मेरे साथी सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक पहलूओं के बारे में लोगों से बातचीत करके जानकारियां इकट्ठा कर रहे हैं। जिसको समाज और सरकार के स्तर पर पहुंचाकर समाधान का प्रयास होगा।
श्री गोविंदाचार्य जी ने विकास की वर्तमान सोच पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा, क्या समृद्धि की तलाश में संस्कृति का विनाश जरूरी है। क्या संस्कृति के साथ समृद्धि को प्राप्त करने के रास्ते पर नहीं चल सकते।

संवाद के क्रम में उन्होंने कहा कि विकास को 5 साल में नहीं प्राप्त किया जा सकता, यह शॉर्ट टर्म गेन है और लॉन्ग टर्म लॉस है।

अधिष्ठान परिवर्तन की जरूरत को बताते हुए श्री गोविंद जी ने कहा कि राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक पहलूओं को लेकर सबको विचार करना चाहिए क्योंकि समय अधिष्ठान परिवर्तन का है। अब मानव केंद्रित विकास की जगह प्रकृति केंद्रित विकास की आवश्यकता है। जिसमें जल, जंगल, जमीन, जानवर का जन के साथ सामंजस्य हो।

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