महापर्व गुरुपूर्णिमा की पावन परंपरा

लखनऊ। निरुद्ध मन की अवस्था में ही सुख शांति रहती है, यह बात विश्व के सभी विचारकों को स्वीकार है। दुनिया भर के सभी साधन मन को वश में करने के लिए ही हैं, पर साधनों का चुनाव व्यक्ति विशेष के लिए एक समस्या होती है। अतएव सद्गुरु से सही यानी उपयुक्त साधन प्राप्त करने की परंपरा हमारे ऋषि-राष्ट्र भारतवर्ष में अनादिकाल से प्रचलित है, जो अब लुप्तप्राय हो रही है। इसे हम सबको मिलकर बचाना है।

हे परम पूज्य गुरुदेव! हम आपके विचारों के बीजों को लोगों के दिमाग में बो सकें, इस वसुधा में-धरती में बो सकें, हम अपने गुरुदेव की काया से ज्यादा महत्व ‘सशक्त गुरुतत्व’ को दे सकें; आज गुरुपूर्णिमा के वार्षिक पर्व पर यही कृपा-आशीर्वाद मुझे प्रदान करने की कृपा करें। “हमारा यह प्यारा सा देश गुरु को मानें, गुरु की भी मानें” भाग्योदय फाउंडेशन के इस आह्वान को सच व सार्थक बना देने की अनुकंपा करें।

भारतवासियों को, भारतवंशियों को गुरुपूर्णिमा की हार्दिक बधाइयां। सभी अच्छों और सच्चों के उज्ज्वल भविष्य की ढेर सारी शुभकामनाएं।

साभार – राम महेश मिश्र, संस्थापक, भाग्योदय फाउंडेशन।

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