अमर शहीद गणेश शंकर विद्यार्थी जी की स्मृति पर विशेष..

नई दिल्ली। यह लेख मेरे परम पूज्यनीय बाबा स्वर्गीय श्री गोपीकृष्ण तिवारी जी ने 30 मार्च 1960 को तत्कलीन प्रतिष्ठित समाचार पत्र रामराज्य में लिखा था..

‘प्रताप’ तथा ‘गणेश सेवा आश्रम’
रामराज्य/30 मार्च 1960
लेखक-श्री गोपी कृष्ण तिवारी

अमर शहीद गणेशशंकर विद्यार्थी की जन्म-तिथि एवं वलिदान-तिथि जब-जब प्रति वर्ष आती है, तब-तब अनायास उनके जैसे महामानव के सही किस्म के दो स्मारकों का स्मरण हो आता है। किसी भी महामानव की वास्तविक स्मृति उसका चित्र या मूर्ति लगा कर या स्थापित कर नित्य अथवा उसकी जन्म या निधन-तिथि पर केवल माल्यार्पण कर ही कायम रखने के कोई अर्थ नहीं हैं। महामानव के आदर्शों का प्रचार और प्रसार तथा उनको अपने जीवन में अपनाना सही अर्थों मे उसकी याद करना है। और यही उसके प्रति हार्दिक श्रद्धांजलि है।
गणेश जी ने ‘प्रताप’ का प्रकाशन कर शोषण एवं अन्याय के विरुद्ध नारा दिया । ‘प्रताप’ ने साम्राज्यवाद तथा सामन्तवादविरोधी युद्ध का नेतृत्व किया और शत-सहस्र नागरिकों को देश की आजादी की लड़ाई लड़ने और वलिदान देने के लिए सनद्ध किया। इस प्रक्रिया में उन्होंने जनतन्त्र का प्रतिपादन किया। उनके जीवनकाल में ‘प्रताप’ में जो कुछ भी प्रकाशित हुआ, वह आज भी हमारे लिए सबक है और आनेवाली पीढ़ी के लिए भी वह सबक रहेगा । ‘प्रताप’ बन्द होगया। क्यों ? इस पर कुछ भी लिखना इस समय उचित नहीं प्रतीत होता; फिर भी इतना तो कहा जा सकता है कि ‘प्रताप’ पर कानूनी तौर पर स्वत्वाधिकार रखने वाले उसके ट्रस्टी-मण्डल में यदि एक भी श्रीगणेश जी जैसा “ट्रस्टी” होता, तो वह ‘प्रताप’ को दुरवस्था एवं अनधिकारी व्यक्तियों के हाथ में पड़ने की प्रक्रिया को उसी वक्त रोक देता, जब उसके दैनिक रूप में पुनः प्रकाशन के अवसर पर उसकी शुरूआत हुई थी। यह सत्य है कि श्रीगणेश जी के महान् वलिदान की सुकीर्ति का शोषण उस पर हावी कर्ता-धर्ताओं ने किया और ट्रस्ट के शेष सदस्यगण आंख मीच कर सोते रहे । वस्तुतः गणेश जी के महान उत्सर्ग के बाद ‘प्रताप’ के अधः गमन की कहानी बड़ी ही दर्दनाक है-इतनी दर्दनाक कि उसकी यहां पर चर्चा न करना ही मुनासिब है। हां, इतना सत्य है कि ‘प्रताप’ की रक्षा की जा सकती थी, बशर्ते श्रीगणेश जी के भक्त, सहयोगी, ट्रस्ट के सदस्यगण तथा उसके अनुरागी पाठक ठीक समय पर इसके लिए समुद्यत होकर,-कमर कस लेते । उनकी उदासीनता के कारण ही ‘प्रताप’ आज अस्तंगत होगया है। हालाँकि यह असम्भव प्रतीत होता है, फिर भी मेरी यह मान्यता है कि यदि आज भो गणेश जी के अनुरागी भक्तगण गणेश जी की उदात्त भावना के अनुसार कानपुर के सार्वत्रिक विकास एवं स्वतन्त्र भारत की जटिल समस्याओं के सामयिक स्वस्थ समाधान की दिशा में मार्ग-दर्शन के उद्देश्य से उसके पुनः प्रकाशन की कोई योजना बनायें, तो वह गणेश जी के आदर्शों के उपयुक्त श्रद्धांजलि होगी। निस्सन्देह इसको उन लोगों से रक्षित रखना होगा, जिन्होंने अपने प्रत्यक्ष कुवृत्तों, दुराग्रहों, अहम्मन्यता, स्वार्थों एवं काम-कलुष के द्वारा ‘प्रताप’ की हत्या करने में सीधा योग प्रदान किया है। देखना है कि नगर, प्रदेश व देश के कितने और कौन गणेश-भक्त सामने आते हैं, जो उनके सही स्मारक ‘प्रताप’ को फिर जीवन-दान देते हैं। चौदह लाख से अधिक की आबादी वाले इस नगर में यदि एक-एक रुपया भी एकत्र किया जा सके तो उसका पुनः प्रकाशन सहज ही हो सकता है। देश व प्रदेश की सरकार चाहे तो वह ‘प्रताप’ को सार्वजनिक क्षेत्र के राष्ट्रीय प्रतिष्ठान एवं स्मारक के रूप में ग्रहण कर उसे राष्ट्र को अर्पित कर सकती है और इस प्रकार वह भी देश की स्वतन्त्रता एवं राष्ट्र को एकता के लिए अात्माहुति देने वाले गणेश जी के यश: काय चरणों पर अपनी उपयुक्त श्रद्धांजलि अर्पित कर सकती है। सरकार के इस प्रयत्न में सभी राष्ट्र कर्मी, देशभक्त तथा पत्रकार एवं लेखक सहयोग करेंगे। इससे देश में निष्पक्ष, निर्भीक तथा उत्कृष्ट आदर्श पत्रकला का विकास होगा और भारत के ‘लोकतन्त्र’ का वास्तविक जनाधार प्राप्त होगा। गणेश जी का दूसरा स्मारक गणेश जी का ‘गणेश सेवा आश्रम’ है। गणेश जी ने अपना कार्यक्षेत्र नरवल को किसानों की सेवा के लिए बनाया था। वह आश्रम आज भी कायम है। उसके कायम करने वाले गणेश जो के सहयोगी सौभाग्य से आज भी हमारे बीच में हैं। किन्तु यह आश्रम भी इस समय लड़बड़ाता नजर आरहा है। एक प्रकार से निर्जीव-सा होगया है। उसे बचाया जा सकता है और उसमें जीवन लाया जा सकता है। यह कार्य इस आश्रम के ट्रस्टियों को करना है। वे कर सकते हैं।
उनमें क्षमता है। मेरी विनम्र अपील है कि गणेश जी के इस दूसरे स्मारक की रक्षा की जाय, इसको मजबूत किया जाय और इसमें नवजीवन पैदा किया जाय ।
पर यदि ‘प्रताप’ के ट्रस्टियों की तरह ‘गणेश-सेवा आश्रम’ के ट्रस्टी भी सोते रहें, तो भय है कि निकट भविष्य में ‘गणेश सेवा आश्रम’ का अस्तित्व भी लुप्त हो जायेगा। गणेश जी का यह ४०वीं वलिदान दिवस मनाना सार्थक हो सकता है,’गणेश सेवा आश्रम’ की सुरक्षा के लिए हम सन्नद्ध होजाये। इस मन्तवय के साथ मैं अमर शहीद की पुण्य स्मृति में अपनी हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। गोविन्दा तिवारी-गार्गी कॉलेज,साउथ कैंपस,दिल्ली विश्वविद्यालय के गवर्निंग बॉडी के सदस्य की कलम से….

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