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भारत के संविधान के अंतर्गत धर्म की स्वतंत्रता

वाराणसी। धर्म की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 से लेकर 28 तक धर्म की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के संबंध में उल्लेख किया गया है। संविधान में पंथनिरपेक्ष राज्य शब्द को अभिव्यक्त रूप से उल्लेखित नहीं किया गया है परंतु इस बात का कोई संदेह नहीं हो सकता कि हमारे संविधान निर्माता ऐसा राज्य स्थापित करना चाहते थे जिसके अनुसार संविधान के यह उपबंध बनाए गए थे। पंथनिरपेक्ष शब्द को बाद में जोड़ा गया परंतु अनुच्छेद 25 में धर्म की स्वतंत्रता का उल्लेख भारत के संविधान को बनाए जाने के समय से है।

अनुच्छेद 25, 28 इसी उद्देश्य की पूर्ति से भारत के संविधान में जोड़े गए हैं कि भारत के संविधान को पंथनिरपेक्ष बनाया जाए। संविधान के 42 वें संशोधन के माध्यम से प्रस्तावना में एक शब्द पंथनिरपेक्ष जोड़ दिया गया।

भारत प्राचीन काल से ही धर्म निरपेक्ष रहा है, यहां सभी धर्म मानने वालों के साथ एक समान व्यवहार किया जाता है इसका तात्पर्य केवल यह है कि राज्य धर्म के मामले में पूरी तरह तटस्थ है। वह किसी भी धर्म के साथ नहीं है तथा राज्य का कोई धर्म नहीं है। राज्य प्रत्येक धर्म को समान रूप से संरक्षण प्रदान करता है वह किसी भी धर्म में हस्तक्षेप नहीं करता है।

राज्य के पंथनिरपेक्ष स्वरूप को कोई रहस्यवाद नहीं है यह न तो ईश्वर विरोधी है और न ही ईश्वर समर्थित है, यह इस मामले में बिल्कुल तटस्थ है। यह भक्तों संशय वादी और नास्तिक सभी को समान मानता है, इसने ईश्वर के संबंध में कोई राज्य को अधिकार और स्थान नहीं दिया और यह बात सुनिश्चित की गई है कि धर्म के आधार पर किसी के विरुद्ध विभेद नहीं किया जाएगा।
राज्य में राज्य का संबंध मानव के आपसी संबंधों से रहता है, मनुष्य ईश्वर के बीच संबंध उसके दायरे से बाहर है। यह व्यक्ति के अंत करण से संबंधित मामला है परंतु प्रत्येक व्यक्ति को अपने विश्वास के अनुसार किसी भी धर्म को मानने तथा किसी भी ढंग से पूजा करने की पूरी स्वतंत्रता होनी चाहिए।

एसआर बोम्मई बनाम भारत संघ 1994 के मामले में यह कहा गया है कि धर्मनिरपेक्षता संविधान का आधारभूत ढांचा है, सभी धर्म और धार्मिक समुदायों के साथ समान व्यवहार करता है, धर्म व्यक्तिगत विश्वास की बात है उसे अलौकिक क्रियाओं में नहीं मिलाया जा सकता है।

न्यायमूर्ति श्री रामास्वामी ने कहा है कि पंथनिरपेक्षता ईश्वर विरोधी भी नहीं है अपेक्षा का अर्थ नास्तिकता भी नहीं है, पंथनिरपेक्षता राष्ट्र और नास्तिक दोनों को एक ही समान एक ही दृष्टि से देखती है। पंथनिरपेक्षता व्यक्तिगत विश्वास को आध्यात्मिक पक्ष से पृथक करती है न तो किसी धर्म का पक्ष लेती है और न ही किसी धर्म का विरोध करती है, राज्य धर्म के मामले में अत्यंत तटस्थ है।

भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 एक सार्वजनिक व्यवस्था सदाचार और स्वास्थ्य तथा इस भाग के दूसरे उपबंध के अधीन रहते हुए सभी व्यक्तियों को अंत करण की स्वतंत्रता तथा धर्म के अवैध रूप से मानने की स्वतंत्रता आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार प्रदान करता है किंतु धर्म स्वतंत्रता का अधिकार भी अन्य अधिकारों की ही भांति आत्यंतिक अधिकार नहीं है।

अनुच्छेद 25 (1) में ही सार्वजनिक व्यवस्था सदाचार और स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए धार्मिक स्वतंत्रता पर राज्य विधि बनाकर निर्बंधन लगा सकता है, इसके अतिरिक्त अनुच्छेद 25 के खंड 2 के उपखंड क और ख के अधीन राज्य इस अधिकार पर विधि बनाकर निम्नलिखित आधारों पर निर्बंधन लगा सकता है।

इस प्रकार व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता पर राज्य निम्न आधारों पर निर्बंधन लगा सकता है-

सार्वजनिक व्यवस्था सदाचार और स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए।
धार्मिक आचरण से संबंधित किसी आर्थिक वित्तीय राजनीतिक या अन्य अलौकिक क्रियाओं को विनियमित और निर्बंधित करने के लिए।
सामाजिक कल्याण और सुधार के लिए अथवा हिंदुओं की सार्वजनिक कार्य संस्थाओं के सभी वर्गों और विभागों के लिए।
भारत का संविधान कहीं भी धर्म शब्द की परिभाषा नहीं देता है, इसके अर्थ को समझने के लिए हमें न्यायिक निर्णय की सहायता लेना होती है। उच्चतम न्यायालय ने इस शब्द की बड़ी विस्तृत परिभाषा प्रस्तुत की है।

न्यायालय ने कहा है कि धार्मिक स्वतंत्रता से ध्यान तक विश्वास तक ही सीमित नहीं है इसके अंतर्गत धर्म के अनुसार किए गए कार्य भी हैं और इसमें कर्मकांड और धार्मिक कार्य संस्कृति और उपासनाओं की पद्धतियों की गारंटी है जो धर्म के अभिन्न अंग है। धर्म या धार्मिक परिपाटी का आवश्यक भाग क्या है उसका निर्धारण न्यायालय द्वारा विशिष्ट धर्म के सिद्धांतों के प्रति निर्देश से किया जाएगा और इसके अंतर्गत ऐसी परिपाटी आती है जिन्हें समुदाय द्वारा धर्म का भाग समझा जाता है।

भारत के संविधान का अनुच्छेद 25 धर्म की स्वतंत्रता के संबंध में दो प्रकार के अधिकार देता है, पहला अधिकार अंत करण की स्वतंत्रता और दूसरा अधिकार धर्म का अबाध मानने आचरण करने और उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता।
अतः करण की स्वतंत्रता का तात्पर्य आत्यंतिक आंतरिक स्वतंत्रता से है जिसके माध्यम से व्यक्ति ईश्वर के साथ अपनी इच्छा अनुसार संबंधों को स्थापित करता है। यह स्वतंत्रता जब बाहरी रूपों में व्यक्त की जाती है तो उसे धर्म का मानना प्रचार करना कहते हैं।

धर्म के मानने से तात्पर्य है व्यक्ति द्वारा अपने धर्म के प्रति श्रद्धा और विश्वासों का स्वतंत्रता पूर्वक और खुलेआम घोषित करना, प्रत्येक व्यक्ति अपने धार्मिक विश्वासों को किसी भी व्यावहारिक रूप से मान सकता है, धर्म के आचरण करने का तात्पर्य धर्म द्वारा विहित कर्तव्यों कर्मकांड और धार्मिक कृत्यों को प्रदर्शित करने की स्वतंत्रता जो उसके धर्म द्वारा विहित किए गए हो।

धर्म के प्रचार करने का अर्थ विचारों को दूसरों तक प्रेषित करना और इसके लिए उनका प्रकाशन करना आवश्यक है। प्रचार का अर्थ अपने विचारों को दूसरों तक प्रेषित करना ही नहीं अपितु उसको मनवाने के लिए समझाने बुझाने का भी अधिकार शामिल है बशर्ते कि इसके संबंध में कोई दबाव का तत्व न हो।

प्रचार करने के अधिकार में किसी व्यक्ति को अपना धर्म परिवर्तन करने के लिए बाध्य करने का अधिकार शामिल नहीं है, अनुच्छेद 25 एक प्रत्येक नागरिक को अंत करण की स्वतंत्रता की गारंटी करता है वह केवल अपने विशेष धर्म को अनुसरण करने का अधिकार प्रदान नहीं करता है, इसमें किसी दूसरे व्यक्ति को अपने धर्म को परिवर्तित करने का मूल अधिकार सम्मिलित नहीं है।

यदि व्यक्ति अपने धार्मिक विचारों को दूसरों तक प्रेषित करने के बजाय उसे धर्म परिवर्तन करने के लिए विवश करता है तो वह उसके अंतरण की स्वतंत्रता पर सीधा आघात करता है जो संविधान द्वारा वर्जित है, यदि विधानमंडल विधि बनाकर कोई ऐसा कानून बनाकर धर्म परिवर्तन का प्रतिषेध करता है तो वह संविधानिक होगा।
बीजो बनाम ऐमेनुअल 1996 के एक प्रकरण में न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक एवं दूरगामी प्रभाव वाले विषय में उच्चतम न्यायालय के दो न्यायाधीशों की खंडपीठ द्वारा यह भी निर्धारित किया गया है कि किसी व्यक्ति को जिसका धार्मिक विश्वास इसकी अनुमति नहीं देता है राष्ट्रगान गाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।

प्रस्तुत मामले में केरल के एक स्कूल के जेहोवा समुदाय के 3 विद्यार्थियों को राष्ट्रगान गाने से इनकार करने पर स्कूल से निकाल दिया गया। उनका यह कहना था कि राष्ट्रगान गाने के लिए उन्हें बाध्य करना संविधान के अनुच्छेद 25 में धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है। शिक्षा विभाग के 1 नियम के अनुसार स्कूलों में सभी बच्चों द्वारा राष्ट्रगान में भाग लेना आवश्यक था।

उनका कहना था कि उनका धर्म जेहोवा उनके ईश्वर के अलावा किसी अन्य धार्मिक समारोह में भाग लेने की अनुमति नहीं देता है, उनका कहना था कि उन्होंने राष्ट्रगान का अपमान नहीं किया था क्योंकि जब राष्ट्रगान गाया जा रहा था तब यह उदारता पूर्वक खड़े थे किंतु गायन में भाग नहीं लिया था।

निष्कासन के विरुद्ध अपील की गई। याचिका केरल उच्च न्यायालय ने खारिज कर दी और निर्णय दिया कि संविधान के अधीन राष्ट्रगान गाना उनका मूल कर्तव्य था और कोई भी नागरिक अपने धार्मिक विश्वासों के आधार पर राष्ट्रगान गाने से इनकार नहीं कर सकता।

बच्चों द्वारा राष्ट्रगान के प्रति आदर न दिखाने से राष्ट्र को खतरा होने की आशंका उत्पन्न हो जाएगी क्योंकि यह लोगों में संविधान के आदेशों की उपेक्षा करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा देगा जिसे हमारे संविधान निर्माता प्राप्त करना चाहते थे। अगर कोई धार्मिक विश्वास लोक व्यवस्था स्वास्थ्य राष्ट्र की एकता और अखंडता के विपरीत है तो उसे लोक हित राष्ट्र हित में त्याग करना होगा। उच्चतम न्यायालय ने केरल हाई कोर्ट के निर्णय को उलट दिया कि भारत में राष्ट्रगान गाने के लिए कोई कानूनी बाध्यता नहीं है।

अनुच्छेद 25(1) के अधिकार को कार्यपालिका के निर्देश द्वारा निमित्त नहीं किया जा सकता है। छात्रों ने अनुच्छेद 51 का उल्लंघन नहीं किया था, वह राष्ट्रगान गाते समय आदर दिखाने के लिए खड़े हुए थे, प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट टू नेशनल एंथम एक्ट 1971 के अधीन उनका कार्य अपराध नहीं था क्योंकि उन्होंने राष्ट्रगान गाने में कोई बाधा नहीं पहुंचाई थी।

अतः न्यायालय ने उनके निष्कासन को रद्द कर दिया। इस निर्णय के अत्यंत दूरगामी परिणाम हो सकते हैं उक्त निर्णय देते समय न्यायाधीशों ने अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का सहारा लिया यह उचित नहीं है। भारत में परिस्थितियां भिन्न है यहां अनेक भाषा अनेक धर्म मानने वाले हैं, देश में एकता और अखंडता को खतरा पैदा करने वाली प्रवृत्तियां काम कर रही है।
रमेश बनाम भारत संघ 1988 के एक मामले में पिटीशनर ने एक लोकहित वाद संस्थित करके न्यायालय से निवेदन किया कि वह समुचित आदेश जारी करें भीष्म साहनी के उपन्यास पर आधारित तमस धारावाहिक को दूरदर्शन पर दिखाए जाने से रोक लगा दे क्योंकि इसे देखकर उनकी धार्मिक भावना को ठेस पहुंचती है।

इस धारावाहिक में भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के पूर्व दोनों समुदाय में हुई धार्मिक हिंसा और मारकाट के दृश्यों को चित्रित किया गया था। उच्चतम न्यायालय ने यह भी निर्धारित किया कि इस मामले में पिटीशनर के अनुच्छेद 25 अधिकार का उल्लंघन नहीं होता है किंतु उसे धार्मिक सहिष्णुता कायम रखने के लिए न्यायालय का ध्यान आकर्षित करने का अधिकार है।

इस मामले में ऐसा कोई संकट नहीं प्रतीत होता है, प्रत्यार्थी ने सीरियल दिखाने में दुर्भावना पूर्वक कार्य नहीं किया है इसके विपरीत लोगों में इससे शिक्षा ही मिलती है ताकि ऐसे कार्यों को भविष्य में दोहराया न जाए।
गुलाम कादर अहमद भाई मेमन बनाम सूरत नगर निगम के मामले में उच्च न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया गया अनुच्छेद 25, 26 में उपलब्ध धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार राज्य को लोक प्रयोजन के लिए किसी पूजा के स्थान को अधिग्रहण करने से वर्जित नहीं करता है।

प्रस्तुत मामले में मुंबई प्रांतीय नगर निगम अधिनियम 1950 की धारा 21(2) की विधिमान्यता को चुनौती दी गई थी। इसके अंतर्गत राज्य ने सड़क चौड़ी करने के प्रयोजन के लिए गुजरात राज्य के सूरत जिले में एक प्रमुख सड़क पर स्थित दो मस्जिदों के कुछ भाग को गिराने का आदेश दिया।

उच्च न्यायालय ने इस्माइल फारूकी बनाम भारत संघ के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय का अनुसरण करते हुए अभिनिर्धारित किया कि संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार राज्य को किसी धार्मिक स्थल या उसके किसी भाग को लोक प्रयोजन हेतु अधिग्रहण करने से वर्जित नहीं करता है। सड़क को चौड़ी करने के उद्देश्य से उक्त मस्जिदों के कुछ भाग को गिराए जाने का आदेश विधिमान्य है।

अनुच्छेद 25, 26 धर्म को संरक्षण प्रदान करते हैं जो धर्म का आवश्यक तत्व है। एक प्रथा धार्मिक प्रथा हो सकती है किंतु वह धर्म का आवश्यकता तो नहीं हो सकती। प्रार्थना पूजा करना एक धार्मिक प्रथा है किंतु प्रत्येक स्थान पर पूजा करना आवश्यक तत्व नहीं है। जब तक कि उसी स्थान पर धर्म में कोई विशेष महत्व न हो और जो उसका आवश्यक तत्व बना देता हो।

न्यायालय ने कहा कि यदि राज्य को किसी सड़क को चौड़ी करने के लिए पूजा स्थल के अधिग्रहण करने की शक्ति प्राप्त है किंतु उसे ऐसा करते समय यह देखना चाहिए कि किसी पूजा के स्थान पर अधिग्रहण प्रयोजन के लिए जरूरी है या नहीं? क्या साधारण जनता को इतनी सुविधा है कि किसी पूजा के स्थान को गिराना आवश्यक है या नहीं? यदि ऐसा है तो पूजा स्थल को गिराया जा सकता है उक्त मामले में सड़क के चौड़ी करने के लिए दोनों मस्जिदों के कुछ भाग को गिराए जाने का नगर निगम का आदेश विधिमान्य है तथा संवैधानिक है।

आर्टिकल by अमित उपाध्याय, अधिवक्ता

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