बाबा कालेश्वरनाथ में स्थापित है एकमात्र धारीदार स्वंयभू शिवलिंग

  • बाबा कालेश्वर नाथ के दर्शनमात्र से ग्रह नक्षत्र हो जाते हैं ठीक

चन्दौली। सावन माह के पहले सोमवार को देर रात तक शिवभक्तों ने सकलडीहा के बठ्ठी स्थित बाबा कालेश्वर नाथ मंदिर में कोविड प्रोटोकॉल के नियमों के तहत दर्शन व पूजन किया। शिवभक्तों ने इस दौरान बाबा कालेश्वर मंदिर के स्वयंभू शिवलिंग पर वेलपत्र, दूध, दही, धतूरा, चंदन और गंगा जल के साथ जलाभिषेक किया। सावन मास का पहला सोमवार होने के कारण शिव भक्तों की भारी भींड़ रविवार की मध्य रात्रि से ही उमड़नी शुरु हो गयी थी। पूरे सावन भर यहाँ शिवभक्तों का जमावड़ा लगा रहता है। परन्तु सोमवार के दिन यहाँ दूर-दराज से लोग दर्शन को आते हैं। मान्यता है कि बाबा के दर्शन मात्र से सभी ग्रह नक्षत्र ठीक हो जाते हैं।सभी अधूरे कार्य पूर्ण होते हैं। सकलडीहा का बरठी स्थित बाबा कालेश्वर नाथ मंदिर काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट से सम्बद्ध है।जो भारत के शिवालयों में से एक है।बाबा कालेश्वर नाथ की मान्यता इस लिए भी बढ़ जाती क्यों कि यहाँ स्थापित शिवलिंग आम शिवलिंग नहीं बल्कि स्वयंभू शिवलिंग हैं। जिसके कारण शिव भक्तों की आस्था यहाँ अधिक है।यहां दर्शन के लिए लोग दूर-दराज से आते हैं और बाबा से मन्नत मांगते हैं। बरठी में बाबा कालेश्वर नाथ मंदिर के इतिहास के बारे मे बताया जाता है कि सकलडीहा कोट के राजा बख्त सिंह की रियासत लगभग ढाई सौ वर्ष पूर्व उत्तर-पूरब में काफी दूर तक फैली हुई थी। इस समय जहाँ कालेश्वर बाबा का मंदिर है वहाँ एकदम घना जंगल हुआ करता था। सफर के दौरान राजा बख्त सिंह की सेना जब आराम करने के लिए एक बार यहाँ रुकी। तो पेड़ के नीचे सोते समय राजा बख्त को स्वप्न में भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए, और कहा कि मैं इसी स्थान पर भूमि के नीचे दबा हुआ हूं।यह स्वप्न देखते ही राजा बख्त सिंह की नींद टूट गई। उन्होंने तुरंत उक्त स्थान पर खुदाई प्रारम्भ करवा दी।खुदाई के समय वहां एक शिवलिंग प्रकट हुआ।जिसकी स्थापना राजा बख्त सिंह ने एक मंदिर का निर्माण करवाकर की। बताते है कि जब मंदिर निर्माण के लिए नींव की खुदाई का कार्य किया जा रहा था तो भगवान हनुमान जी की एक मूर्ति प्रकट हुई।इस लिए मंदिर के दूसरे हिस्से में उन्हें भी स्थापित कर दिया गया। राजा द्वारा मंदिर के आचार्य के रूप में पाठक परिवार को यह जिम्मेदारी सौंपी। अब यहां काशी विश्वनाथ ट्रस्ट के माध्यम से मंदिर के पुजारी की नियुक्ति की जाती है।बाबा कालेश्वर नाथ की कई कहानियां प्रचलित हैं।बता दें की कई वर्षों पूर्व एक राहगीर द्वारा मांगी गई मन्नत पूरी नही होने से नाराज होकर क्रोधवश उसने छेनी से बाबा कालेश्वर के शिवलिंग पर वार कर दिया था। जिसके बाद शिवलिंग से खून की धारा निकल पड़ी थी।बाद में काशी से आए विद्वानों ने शिवलिंग का दुग्धाभिषेक किया।तब जाकर शिवलिंग से खून की धार निकलना बंद हुआ।आज भी शिवलिंग पर छेनी के चोट का निशान देखा जा सकता है। बाबा कालेश्वर नाथ से जुड़ी एक और कहानी प्रचलित है। कहा जाता है कि बाबा बारिश के होने न होने का भी संकेत देते हैं। बारिश होने के पूर्व बाबा के शिवलिंग पर काई जम जाती है।उस दौरान भक्तों द्वारा उसे रगड़ कर साफ किया जाता है। इसके बावजूद काई पुनः जम जाती है। वहीं जब कभी शिवलिंग पर बारिश के मौसम में काई नहीं जमती है तब सूखा पड़ जाता है। इस दौरान शिवलिंग के अरघे के छेद को बंद कर के उनमे गंगाजल भरकर महादेव का आवाहन किया जाता है। बता दें कि अर्घे की ऊँचाई शिवलिंग से अधिक होने के बावजूद शिवलिंग पूर्ण रूप से डूबता नहीं है। जिसे बाबा कालेश्वर का चमत्कार माना जाता है।बाबा कालेश्वर नाथ मंदिर को एक और खासियत उन्हें पूरे भारत मे सबसे अलग होने की ख्याति प्रदान करती है।बरठी स्थित बाबा कालेश्वर नाथ मंदिर में स्वयंभू शिवलिंग पर धारीदार रेखाएं बनी है। जिसकी अपनी पौराणिक महत्ता है। विद्वानों के अनुसार ऐसा शिवलिंग केवल एक ही पूरे भारत मे है।

( साभार – तारकेश्वर सिंह, वरिष्ठ पत्रकार )

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