व्यसन, अव्यवस्था, अस्त-व्यस्तता व आलस्य अथवा प्रमाद जीवनकाल के विरोधी दुर्गुण हैंं- स्वामी अवधेशानंद गिरि

हरिद्वार। पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – “अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते …”। अध्यात्म सत्ता नैतिक, आर्थिक, आत्मिक और कलात्मक उत्थान का आधार है ! जीवन में पूर्व से ही निहित भगवत्ता को उद्घाटित करने में सहज साधन है – अध्यात्म-विद्या। अतः जीवन सिद्धि व सार्थकता के लिये आध्यात्मिक अभ्यास निर्बाध रहे ..! अध्यात्म से मानव-जीवन का चरमोत्कर्ष उपलब्ध होता है। जीवन को सुखद बनाता है – अध्यात्म। जीवन को सुचारु रूप से चलाने की वह वैज्ञानिक पद्धति एकमात्र अध्यात्म ही है, जिसे जीवन जीने की कला भी कहा जा सकता है। इस सर्वश्रेष्ठ कला को जाने बिना जो मनुष्य जीवन को अस्त-व्यस्त ढंग से बिताता रहता है। उसे, उनमें से कोई भी ऐश्वर्य उपलब्ध नहीं हो सकता, जो लोक से लेकर परलोक तक फैले पड़े हैं। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष जिनके अंतर्गत आदि से लेकर अन्त तक की सारी सफलतायें सन्निहित हैं, जो इसी जीवन कला के आधार पर ही मिलते हैं। जीवन विषयक अध्यात्म हमारे गुण, कर्म, स्वभाव से सम्बन्धित हैं। इसलिए हमें चाहिये कि हम अपने में गुणों की वृद्धि करते रहे। ब्रह्मचर्य, सच्चरित्रता, सदाचार, मर्यादा-पालन और अपनी सीमाओं में अनुशासित रहना आदि ऐसे गुण हैं, जो जीवन जीने की कला के नियम माने गये हैं। व्यसन, अव्यवस्था, अस्त-व्यस्तता व आलस्य अथवा प्रमाद जीवनकाल के विरोधी दुर्गुण हैं। अतः इनका त्याग करने से जीवनकाल को बल प्राप्त होता है। हमारे कर्म भी गुणों के अनुसार ही होने चाहिये। गुण और कर्म में परस्पर विरोध रहने से जीवन में न शांति का आगमन होता है और न प्रगतिशीलता का समावेश। हममें सत्य-निष्ठा का गुण तो हो पर उसे कर्मों में मूर्तिमान् करने का साहस न हो तो कर्म तो जीवन कला के प्रतिकूल होते ही है, वह गुण भी मिथ्या हो जाता है। अध्यात्म मानव जीवन के चरमोत्कर्ष की आधारशिला है, मानवता का मेरुदण्ड है। इसलिए मनुष्य जाति की अगणित समस्याओं को हल करने और सफल जीवन जीने के लिये अध्यात्म से बढ़कर कोई उपाय नहीं है …।

पूज्य “आचार्यश्री” जी ने कहा – मनुष्य की मूल प्रकृति निर्दोष, सहज और आनन्द से परिपूर्ण जीवन जीना है, जबकि आज मनुष्य का जीवन यंत्रों और उपकरणों पर निर्भर हो गया है। इसलिए मनुष्य को आवश्यकताओं के अनुकूल ग्रहण करना चाहिए और इससे आगे कोई लालसा नहीं रखनी चाहिए। यही सादगी का जीवन है। सादगी को अपनाए बिना सुख-शांति प्राप्त नहीं की जा सकती। जब तक और अधिक पाने की लालसा बनी रहेगी, तब तक मनुष्य अन्य जीवों का हितैषी नहीं बन सकता। लेकिन जैसे ही वह सादगी अपनाकर अपनी आवश्यकताओं को समेट लेता है, उसके लिए संरक्षक की मूल भूमिका निभाना संभव हो जाता है। इस प्रकार यह प्रयास ही आध्यात्मिक विकास है। अध्यात्म मानव जीवन में संतुलन लाता है। जीवन में वैज्ञानिक और तकनीकी आविष्कारों की उपयोगिता से भी इन्कार नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसी से मानव की सोच आधुनिक हुई है। उसके जीवन में आर्थिक प्रगति हुई है और जीवन स्तर में सुधार हुआ है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि मानव सुख-सुविधाओं और भोग-विलास में पड़कर नैतिक पतन की ओर बढ़ने लगा है। आध्यात्मिक ज्ञान उसे इन सबसे रोक सकता है। दुविधा और संकट की दशा में यह उसे सही दिशा दिखा सकता है। जहां विज्ञान मानव के जीवन स्तर का उत्थान करता है, वहीं अध्यात्म उसकी आत्मा के उत्थान के लिए जरूरी है। इसलिए हम यह कह सकते हैं कि मानव जीवन में विज्ञान और अध्यात्म दोनों का ही महत्व है। जब उसके एक हाथ में विज्ञान और दूसरे में अध्यात्म होगा, तभी वह संतुलित जीवन व्यतीत कर सकेगा …।

🌿 पूज्य “आचार्यश्री” जी ने कहा – प्रारम्भ से ही मनुष्य अपनी इच्छाओं का दास रहा है। आदिकाल में उसकी इच्छाएं और आवश्यकताएं सीमित थीं। लेकिन सभ्यता, संस्कृति और ज्ञान के विकास के साथ-साथ उसकी आवश्यकताएं बढ़ती गईं। इससे संसार में उपयोगितावाद, उपभोक्तावाद और भौतिकवाद का जन्म हुआ। भौतिकवाद जीवन की ऐसी पद्धति है जो सुख-सुविधाओं, भोग-विलास और आधुनिक संसाधनों से परिपूर्ण होती है। यूरोपीय देशों में विज्ञान का अधिक विकास हुआ है। इन लोगों ने अपने जीवन को भौतिकवादी बना लिया। उनका जीवन उन्हीं सुख-सुविधाओं पर आधारित है। बहुत अधिक भौतिक साधनों के संचय की इस भूख के चलते मनुष्य जल्दी ही ईमानदारी, नीति, न्याय और धर्म की सीमा लांघकर अनुचित और असत्य की राह पकड़ लेता है। तेज गति से चलता हुआ वह आत्मा-परमात्मा से इतनी दूरी बना लेता है कि उसकी आवाज भी सुनाई नहीं देती। ईर्ष्या, छल-कपट, असत्य और अनीति का मजबूत आवरण उसे मार्ग से भटका देता है। आध्यात्मिक ज्ञान मानव को पतन की ओर अग्रसर होने से रोकता है। भौतिकता के कारण इंसान के अंदर जो अंधकार उत्पन्न हुआ है, उसे अध्यात्म के प्रकाश से ही दूर किया जा सकता है। आध्यात्मिक ज्ञान ही उसे यह समझाने में सहायक हो सकता है कि इस जगत का असली सृष्टिकर्ता और सर्वेसर्वा ईश्वर ही है। मानव तो उसकी एक रचना मात्र है। यहाँ तक कि उसका जीवन भी नश्वर है और एक न एक दिन सब नष्ट हो जाएगा। फिर भी इनके पीछे इतनी आपाधापी क्यों? इसलिए अध्यात्म स्वयं को सुधारने, जानने और संवारने का मार्ग है। यह स्वयं का अध्ययन है और भाव-संवेदनाओं का जागरण है, आत्म-तत्व का बोध है, धर्म का मर्म है और स्व का ध्यान है …।

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