हरिद्वार। पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – “ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ..!” ईश्वरीय शक्ति में पूर्ण विश्वास रखें। सर्वोच्च भगवान सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान हैं। सम्पूर्ण ब्रह्मांड एक परिवार है। भारतीय वैदिक दर्शन सार्वभौमिक स्वीकृति, सद्भाव और शांति पर आधारित है। यह सम्पूर्ण विश्व बीज रूप में सर्वशक्तिमान ब्रह्म-शक्ति का ही विस्तार है। समग्र रूप से यहाँ की जो भी सत्ता दृश्य-अदृश्य अथवा अनुभूत होती है वह परमात्मा के ही संकल्प की साकारता है, ईश्वर से विलग यहाँ कुछ भी नहीं है। स्वयं आप भी उसी का स्वरूप हैं। विभिन्नताएँ और विविधताएँ केवल अज्ञान से ही ज्ञात होती हैं। ज्ञान प्राप्ति के बाद इस भिन्नता का भी अवसान हो जाता है। अतः इस सत्य को उजागर करने वाली अध्यात्म सम्पदा सहेजें। अध्यात्म से हमें यह बोध होता है कि वह तो हर समय, हर स्थान पर विद्यमान है। एक अणु भी उससे रहित नहीं है। वह हमारे भीतर ही बैठा हुआ है। किन्तु, हम अपने अहंकार के कारण उसे जान नहीं पाते। ईश्वर हमारा महान उपकारी पिता है। वह हमारा स्वामी और सखा भी है। हमें उसके प्रति सदा आस्थावान रहना चाहिये और आभारपूर्वक उसके उपकारों को याद करते हुए उसके प्रति विनम्र एवं श्रद्धालु बने रहना चाहिये। इसमें हमारा न केवल सुख निहित है, बल्कि लोक-परलोक दोनों का भी कल्याण है। वह करुणा सागर है, दया का आगार है। जिसने ईश्वर से मित्रता कर ली है, उसे अपना साथी बना लिया है, उसके लिये यह संसार बैकुण्ठ की तरह आनन्द का सागर बन जाता है। जिसकी यह सारी दुनिया है, जो संसार का स्वामी है, उससे सम्पर्क कर लेने पर, साथ पकड़ लेने पर, फिर ऐसी कौन-सी सम्पदा, फिर ऐसा कौन-सा सुख शेष रह सकता है, जिसमें भाग न मिले? अतः जो स्वामी का सखा है, वह उसके ऐश्वर्यों का भी भागी हो जाता है …।
पूज्य “आचार्यश्री” जी ने कहा – पश्चिमी देश विश्व को एक बाजार की दृष्टि से देखते हैं, जबकि भारतीय चिंतन पूरी दुनिया को एक परिवार मानता है। ब्रह्मांड एक परिवार है और सबका मालिक ईश्वर एक है। पूज्य “आचार्यश्री” जी ने अपनी धारणा व्यक्त करते हुए कहा कि केवल एक ही ईश्वर है जो पूरे ब्रह्मांड को नियंत्रित करता है। ब्रह्मांड में सभी कृति पूरी तरह से उनकी इच्छा से है। इसके अतिरिक्त, हम सभी मनुष्य एक ही सर्वशक्तिमान के संतान हैं। विश्व के सभी धर्म प्रेम, शांति और भाईचारे का समान संदेश देते हैं। हालांकि, विविध जलवायु, सांस्कृतिक, जातीय और क्षेत्रीय कारकों के कारण भगवान को प्राप्त करने के उपाय और साधन भिन्न हो सकते हैं; लेकिन सभी का अंतिम लक्ष्य है – ईश्वर की प्राप्ति। पूज्य “आचार्यश्री जी” कहते हैं कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ सभी धर्मों के शब्दों और कर्मों में सम्मान दिखाने का है। उन्होंने धर्म का विवेचन करते हुये कहा कि जो हमें अच्छा नहीं लगता वह दूसरों के साथ नहीं करें, यही धर्म है। हम समर्थन भले नहीं करें, पर दूसरों को सुनने की क्षमता एवं आदर देने की आदत होनी ही चाहिये। उन्होंने कहा कि जब वाद के साथ विवाद जुड़ता है तो वह संघर्ष को जन्म देता है। हम अपने धर्म या विचारों का आदर तो करें, पर अन्यों का अनादर नहीं हो। उन्होंने कहा कि धरती को अध्यात्म ही बचा सकता है। इससे विश्व की ऐसी कोई समस्या नहीं है जिसका हल नहीं खोजा जा सकता है। धर्म, दर्शन की विविधता भारत का सौंदर्य है। परम्पराएं, मान्यतायें, उपासना पद्धति अलग-अलग हो सकती है, लेकिन भारत की धरती में इस अनेकता का आदर होता आया है। भारत की संस्कृति सभी को अपनी बात कहने, मान्यताओं को मानने का अवसर देती है। हम सभी के सुख की बात करते हैं, किसी एक के सुख की नहीं। उन्होंने कहा कि पश्चिम का प्रच्छन्न भोगवाद अथवा उपभोक्तावादी संस्कृति ने हमें ग्राहक तथा उपभोगी बना दिया है। इसलिये सजग रहने की आवश्यकता है और इस सजगता का द्वार धर्म से खुलेगा। अतः समग्र कल्याण के लिये आर्थिक सम्पन्नता एवं भौतिक विकास के साथ-साथ आत्मिक सुख भी जरूरी है। विश्व के सभी धर्मों का सार जीव-जन्तु के प्रति दया अभिव्यक्त करना है। सभी धर्म कर्मकाण्ड की विविधता के बाद भी मानव कल्याण में विश्वास करते हैं। दुनिया में विभिन्न जाति, धर्म व सम्प्रदाय के लोग रहते हैं, मगर उनके रक्त का रंग एक जैसा ही लाल है। विश्व के सभी धर्म अनुशासन, नैतिकता और बुद्धिमता का उपदेश देते हैं। सभी धर्म समानता और बंधुत्व की शिक्षा देते हैं। अतः सभी धर्म युद्ध के बजाय शांति का उपदेश देते हैं तथा परस्पर भाईचारे में विश्वास करते हैं, जिससे विश्व में प्रेम, सद्भाव एवं सम्पूर्ण जीवों के प्रति कल्याण की भावना बनी रहे?





