अध्यात्म आत्म-उत्कर्ष , जीवन-सिद्धि अखण्ड-आनंद एवं परम-शान्ति का मार्ग है – स्वामी अवधेशानंद गिरि

हरिद्वार। पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – “अध्यात्मज्ञान नित्यत्वं तत्वज्ञानार्थ दर्शनं ..!” अध्यात्म निजता अर्थात् स्वभाव की यात्रा है। अज्ञान निवृत्ति, आत्मजागरण एवं इहलौकिक – पारलौकिक अनुकूलताओं का सृजन आध्यात्मिक जीवनशैली द्वारा ही सम्भव है। अतः आध्यात्मिक अंत:करण की निर्मिति करें…! ( श्रीमद्भगवद्गीता) आध्यात्मिक बनिए। अध्यात्म की दृष्टि से देखिए, फिर आपको जो आत्मिक सुख मिलेगा वह संसार के भौतिक पदार्थों से बिलकुल ही अलग होगा। आत्म स्वरूप में लौटना ही अध्यात्म है। अध्यात्म आत्म-उत्कर्ष , जीवन-सिद्धि अखण्ड-आनंद एवं परम-शान्ति का मार्ग है। भ्रम-भय, दैन्य-संशय, अल्पता-अभाव आदि समस्त मानवीय दुर्बलताओं की एकमात्र औषधि अध्यात्म ही है ! अतएव, वैश्विक शान्ति-समन्वय और आत्मिक उत्कर्ष के लिए आध्यात्मिक जीवनशैली के अनुगामी बनें। अध्यात्म सत्ता नैतिक, आर्थिक, आत्मिक और कलात्मक उत्थान का आधार है ! श्रेष्ठता, पवित्रता, शुभता और मनुष्य-जीवन में निहित भगवत्ता को उद्घाटित करने में सहज साधन है – अध्यात्म-विद्या। अतः जीवन सार्थकता के लिये आध्यात्मिक अभ्यास निर्बाध रहे …।

पूज्य “आचार्यश्री” जी ने कहा – अध्यात्म क्षमा और शांति की ऐसी कुंजी है जिसके माध्यम से व्यक्ति को यह ज्ञान होता है कि वह स्वयं क्या है? अध्यात्म हमें बताता है कि हमारा असली ‘आपा’ हमारी आत्मा है। यह इस बात का अनुभव कराता है कि हम मात्र शरीर या मन नहीं, बल्कि वह आत्मा हैं जो हमारे इस शरीर में बस रही है। हम अपने आपको सिर्फ एक शरीर समझते हैं जिसका कि एक नाम है। इस तरह हम अपने आपको भारत, फ्रांस, अमेरिका अथवा किसी भी देश का नागरिक समझते हैं या फिर किसी एक अथवा दूसरे धर्म से जुड़ा हुआ मानते हैं। पर, अध्यात्म के द्वारा हम यह जान जाते हैं कि इन सभी भिन्न-भिन्न बाहरी नामों और ठप्पों के पीछे, मूलतः हम सभी आत्मा हैं और एक ही परमपिता परमात्मा के अंश हैं। अब प्रश्न उठता है कि हम आध्यात्मिक क्यों बनें ? क्या फायदा है आध्यात्मिक बनने का? उत्तर स्पष्ट है – अध्यात्म के द्वारा हम सहानुभूति, परस्पर मैत्री की भावना, क्षमा और शांति की भावना को जाग्रत करते हैं। जब हमारा दृष्टिकोण आध्यात्मिक बन जाता है, तब हम किसी को भी पक्षपात या भेदभाव की दृष्टि से नहीं देखते। हम उन दीवारों को हटाने लग जाते हैं जो मानव-मात्र को एक-दूसरे से अलग करती हैं। हम यह अनुभव पाने लगते हैं कि आत्मिक स्तर पर हम सभी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं …।

पूज्य “आचार्यश्री” जी ने कहा – जब हमारे भीतर एकत्व के भाव का प्रादुर्भाव होता है, जब हम अपनी एकता और अपने आपसी संबंधों की पहचान कर लेते हैं तो फिर हम एक-दूसरे की सहायता करने लगते हैं। तब हमारे सोचने की विचारधारा में अंतर आ जाता है। पड़ोस में भूख से रोते बच्चे की आवाज से हमें उतनी ही पीड़ा अनुभुत होती है जितनी कि अपने बच्चे के रोने से। हम सड़क पर बेसहारा घूमते बूढ़े इंसान में अपने बेसहारा दादा को देखते हैं और उसकी मदद को प्रेरित होते हैं। हमारा दृष्टिकोण विशाल हो जाता है। हम सभी यदि दृढ़ संकल्प करें तो अपना आध्यात्मिक पक्ष मजबूत कर सकते हैं। सदियों से इसके लिए एक समाधान उपलब्ध है। ध्यान-साधना की विधि को सीखकर हम प्रतिदिन कुछ समय अपने अंतर में प्रभु के साथ गुजार सकते हैं। जैसे-जैसे प्रभु हमें प्रेम और आनन्द से सराबोर करेगा, वैसे-वैसे हमारी वे पुरानी आदतें धुलती चली जाएंगी, जिनके कारण हम नफरत और पक्षपात से भरे रहते हैं। इस प्रकार अध्यात्म हममें प्रेम, क्षमा और दया के गुण भर देता है …।

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