समय का दुरुपयोग करना जीवन को नष्ट करना हैै – स्वामी अवधेशानंद गिरि

हरिद्वार। पूज्य “सद्गुरुदेव” जी ने कहा – “अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते। तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि …”।। ( – श्रीमद्भगवद्गीता) जीवन अनमोल और दिव्य है। हर पल के मूल्य की सराहना करें और उसका सार्थक उपयोग करें ..! जिस प्रकार समुद्र की लहरें किसी की प्रतीक्षा नहीं करतीं, ठीक उसी प्रकार समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता। बिता हुआ समय कभी लौटकर वापस नहीं आता, इसलिए हमारे लिए जीवन में सबसे बहुमूल्य अगर कोई वस्तु है तो वो ‘समय’ है। धन की हानि होती है तो उसे पुनः प्राप्त किया जा सकता है, किन्तु समय अगर हमारा व्यर्थ चला जाता है तो उसे पुनः वापस लाने का कोई मार्ग नहीं। समय ही जीवन की परिभाषा है, क्योंकि समय से ही जीवन बनता है। समय का सदुपयोग करना जीवन का उपयोग करना है। समय का दुरुपयोग करना जीवन को नष्ट करना है। संसार में जितने भी महान पुरुष हुए हैं उनकी महानता का एक ही आधार स्तम्भ है कि उन्होंने अपने समय का पूरा-पूरा सदुपयोग किया। एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाने दिया। जिस समय लोग मनोरंजन, खेल-तमाशों में मस्त रहते हैं, व्यर्थ आलस्य प्रमाद में पड़े रहते हैं, उस समय महान व्यक्ति महत्त्वपूर्ण कार्यों का सृजन करते रहते हैं। ऐसा एक भी महापुरुष नहीं जिसने अपने समय को नष्ट किया हो और वह महान बन गया हो। समय बहुत बड़ा धन है, कहीं भौतिक धन से भी अधिक मूल्यवान। जो इसे भली प्रकार उपयोग में लाता है वह सभी तरह के लाभ प्राप्त कर सकता है। छोटे से जीवन में भी बहुत बड़ी सफलतायें प्राप्त कर लेता है। वह छोटी सी उम्र में ही दूसरों से बहुत आगे बढ़ जाता है। जीवन का हर क्षण एक उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना लेकर आता है। हर घड़ी एक महान मोड़ का समय हो सकती है। मनुष्य यह निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता कि जिस वक्त, जिस क्षण और जिस पल को यों ही व्यर्थ में खो रहा है वह ही क्षण, वह ही वक्त क्या उसके भाग्योदय का वक्त नहीं है? इसलिए क्या पता जिस क्षण को हम व्यर्थ समझकर नष्ट कर रहे हैं, वह ही हमारे लिये अपनी झोली में सुन्दर सौभाग्य की सफलता लाया हो …।

पूज्य “आचार्यश्री” जी ने कहा – मनुष्य के अन्तःकरण में ही उसका देवत्व और असुरत्व विद्यमान है। जब तक हमारा देवता जागृत रहता है और हम विभिन्न कल्याणकारी कार्यों में संलग्न रहते हैं तब तक आन्तरिक असुरता भी दबी हुई पड़ी रहती है, पर यह प्रसुप्त वासनायें भी अवकाश के लिये चुपचाप अन्तर्मन में जगती रहती हैं और समय पाते ही देवत्व पर प्रहार कर बैठती हैं? जब यह दिखाई दे कि अब अपने पास कोई काम शेष नहीं रहा तो मनुष्य अपने निवास के आस-पास की सफाई, वस्त्रों की देखरेख, घर की मरम्मत, खेतों की देख-भाल, लेखन, ज्ञान विषयक चर्चा या किसी जीवनोपयोगी साहित्य का स्वाध्याय ही करने लग जाये। इससे टूटी-फूटी वस्तुओं की साज-सम्हाल, स्वास्थ्य-रक्षा और ज्ञान की वृद्धि ही होगी। समय का मूल्यांकन केवल रुपये पैसे से ही नहीं हो सकता। जीवन में और भी अनेकों पारमार्थिक व्यवसाय हैं। उन्हें भी देखना और ज्ञान प्राप्त करना हमारा धर्म होना चाहिए।सत्कार्यों में लगाये गये समय का परिणाम सदैव सुखदायक ही होता है। संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं जिसकी प्राप्ति मनुष्य के लिये असम्भव हो। प्रयत्न और पुरुषार्थ से सभी कुछ पाया जा सकता है, लेकिन एक ऐसी भी चीज है जिसे एक बार खोने के बाद कभी नहीं पाया जा सकता और वह है – समय। एक बार हाथ से निकला हुआ समय फिर कभी हाथ नहीं आता। कहावत है – ‘‘बीता हुआ समय और कहे हुए शब्द कभी वापस नहीं बुलाये जा सकते’’। समय से महान कुछ भी नहीं है। भक्ति साधना द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार कई बार किया जा सकता है, लेकिन गुजरा हुआ समय पुनः नहीं मिलता। अतः समय संयम सफलता की निश्चित कुन्जी है और इसे प्राप्त करना प्रत्येक बुद्धिमान का मानवीय कर्त्तव्य भी है …।

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